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January 28, 2012

संकीर्ण हृदय

तसवीरें धुंधली सी हैं, चेहरे कुछ साफ़ नहीं,
बातें आधी-अधूरी, वाकये कुछ याद नहीं |
तलाशती हूँ कुछ यादों को, उन लम्हों को;
बीते पल के लम्हे क्या यादों को खरोचने से मिलेंगे?
क्यों जीती-जागती ज़िन्दगी यादों के धुएं में खो गयी?
क्यों नहीं जी पा रही हूँ मैं उनको दोबारा?
कोसती हूँ रोज़ अपने कुम्भ्लाये वजूद को;
दिल सिकुड़ के छोटा सा हो गया है
उनकी यादें समेटने में नाकाम |



3 comments:

Sri said...

I love to read your poems because ofcourse its too good :) but also it helps me to revise my hindi :) So, keep writing.

Anuradha Sinha said...

Thanks a ton, Sri.

Madhuresh said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं!!

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